गिरा सकते हो मुझे कितना
गिरा सकते हो मुझे कितना,
मै फिर उठ खडा हो जाऊंगा।
बीज हु मै, धरती को चीर ,
फिर फूल सा मुस्कुराउंगा।
मेरे होसलो को तुम कहा झुका पाओगे,
मै बाज़ हु मुझे कैसे कैद कर पाओगे ।
तोड़ सको जितना, उतनी बार तोड़ लेना,
मैं मकड़ी सा जाला फिर से बनाऊंगा।
गिरा सकते हो मुझे कितना,
मैं फिर उठ खड़ा हो जाऊंगा।
मैं नदी सा चंचल हु,
पहाड़ तोड़ रास्ता बनाऊंगा।
तुम चाहे घने बादल से गरजना
मै इंद्धनुष् बन आसमान पर छाउँगा।
हिम्मत को टुटने नही दूंगा,
तुम्हारे तीरो से मैं अपना छत्र बनाऊंगा।
गिरा सकते हो मुझे कितना,
मैं फिर उठ खडा हो जाऊंगा।
मैं सुवर्ण कुंदन हु,
भट्टि मे निरंतर चमकता जाऊंगा।
बंद अगर हु पिंजरे मे तो क्या हुआ,
इस लोह तार को इक दिन तोड़ जाऊंगा।
मैं कृष्ण हु, जकड़ लो बेड़ियों मे मुझे,
मैं फिर भी तुम्हारे कैद से निकल जाऊंगा।
गिरा सकते हो मुझे कितना
मै फिर उठ खड़ा हो जाऊंगा।

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